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यह समय अभी क्या बात मेरी सुनेगा – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Kya Yah Samay Meri Baat Sunega”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “यह समय अभी क्या बात मेरी सुनेगा”

Trilochan

यह समय अभी क्या बात मेरी सुनेगा
रुक कर पथ में ही या यथापूर्व आगे
प्रतिपल बढ़ता ही जाएगा और पीछे
फिर कर न तकेगा बात जैसी रही है ।

युग पिछड़ गए हैं, आज कोई कहानी
सुन कर दुहराना भी नहीं चाहता है
पग पग चल आए पैर पृथ्वी अभी है
यदि ठहर गए तो बात की बात क्या है ।

घिर-घिर घन आए, व्योम ने गान गाया,
फिर फिर नव वर्ष्जा नृत्य अपना दिखा के
जल बन कर छाई, भूमि ने रंग पाए
खिल खिल कर पौधे भेंट जैसे खड़े हैं ।

शश उछल रहे हैं घास के बीच जैसे
घन धवल कहीं हों व्योम की नीलिमा में
तृण हरित समेटे ताल ध्यानस्थ से हैं
ध्वनि उमड़ रही है वायु में सारसों की ।

रँग रँग उठता है छोर कोई दिशा का
उठ उठ कर पौधे धान के ताकते हैं
सुरभि लहर लेती व्योम को बासती है
रस बस कर मेरी बात भी खेलती है ।

Yah Samay Abhi Kya Baat Meri Sunega

Yah samay abhii kyaa baat merii sunegaa
Ruk kar path men hii yaa yathaapoorv aage
Pratipal badhtaa hii jaaegaa aur piichhe
fir kar n takegaa baat jaisii rahii hai

Yug pichhad gae hain, aaj koii kahaanii
Sun kar duharaanaa bhii nahiin chaahataa hai
Pag pag chal aae pair prithvii abhii hai
yadi Thahar gae to baat kii baat kyaa hai

Ghir-ghir ghan aae, vyom ne gaan gaayaa,
Fir fir nav varSjaa nrity apanaa dikhaa ke
Jal ban kar chhaaii, bhoomi ne rang paae
Khil khil kar paudhe bhenT jaise khade hain

Shash uchhal rahe hain ghaas ke biich jaise
Ghan dhaval kahiin hon vyom kii niilimaa men
TriN harit sameTe taal dhyaanasth se hain
Dhvani umad rahii hai vaayu men saarason kii

Rang rang uthataa hai chhor koii dishaa kaa
Uth uth kar paudhe dhaan ke taakate hain
Surabhi lahar letii vyom ko baasatii hai
Ras bas kar merii baat bhii khelatii hai

आदमी की गंध – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Aadmi Ki Gandh”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “आदमी की गंध”

Trilochan

आदमी को जब तब आदमी की ज़रूरत होती है। ज़रूरत होती है, यानी, कोई
काम अटकता है। तब वह एक या अनेक आदमियों को बटोरता है।
बिना आदमियों के हाथ लगाये किसी का कोई काम नहीं चलता।

गाँव में ही मैंने अपना बचपन बिताया है। जानता हूँ लोग अपना काम
सलटाने के लिए इनको उनको भैया, काका या दादा आदि आदर के
स्वर में बुलाते हैं। कुछ मज़ूर होते हैं कुछ कुछ थोड़ी
देर के लिए सहायक होते हैं। जो सहायक होते हैं उनके यहाँ ऐसे ही
मौक़ों पर ख़ुद भी सहायक होना पड़ता है ; इसमें यदि चूक हुई तो
मन भीतर-ही-भीतर पितराता है। जिसकी ओर चूक हुई उसकी ओर
लोग बहुधा आदत समझ लेते हैं।

गाँवों का काम इसी तरह चला करता था और अब भी चलता है। पहले के
गाँव अब बहुत बदल गए हैं। कामों का ढंग भी बदला है। खेती
सिंचाई-पाती और घरबार का रूप-रंग और ढंग बदला है। गाँवों में
अब जिनका पेट नहीं भरता वे शहर धरते हैं। शहरों में बड़े-बड़े
कारखाने होते हैं। गाँवों के लोग इन्हीं में से किसी एक में जैसे-तैसे
काम पता जाते हैं। कोई साइकिल-रिक्शा किराये पर चलते हैं।

शहरों में आदमी को आदमी नहीं चीन्हता। पुरानी पहचान भी बासी होकर
बस्साती है। आदमी को आदमी की गंध बुरी लगती है। इतना ही
विकास, मनुष्यता का, अब हुआ है।

दुनिया का सपना – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Duniya Ka Sapna”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “दुनिया का सपना”

Trilochan

तुम, जो मुझ से दूर, कहीं हो, सोच रहा हूँ,
और सोचना ही यह, जीवन है इस पल का,
अब जो कुछ है, वह कल के प्याले से छलका,
गतप्राय है। किसी लहर में मौन बहा हूँ,

अपना बस क्या। जीवन है दुनिया का सपना,
जब तक आँखों में है तब तक ज्योति बना है।
अलग हुआ तो आँसू है या तिमिर घना है।
बने ठीकरा तो भी मिट्टी को है तपना।

कल छू दी जो धूल आज वह फूल हो गई,
चमत्कार जिन हाथों में चुपचाप बसा है,
ऐसा हो ही जाता है। यह सत्य कसा है
सोना, जिस पर जमे मैल की पर्त खो गई।

पथ का वह रजकण हूँ जिस पर छाप पगों की
यहाँ वहाँ है; मूक कहानी सहज डगों की।

जीवन का एक लघु प्रसंग – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Jeevan Ka Ek Laghu Prasang”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “जीवन का एक लघु प्रसंग”

Trilochan

तब मैं बहुत छोटा था
कौन साल, कौन मास और कौन दिन था
यह सब कुछ याद नहीं,
जानता भी नहीं था,
पढ़ता था;
नाम और ग्राम लिखना आ गया था

स्कूल जाने का समय हो आया था
बहुत व्यग्र बुआ के पास खड़ा-खड़ा मैं
उससे किताबें नई लेने के लिए पैसे मांग रहा था

बुआ ने पूछा : जो किताबें अभी ली गई थीं उसको क्या पढ़ लिया

मैंने कहा : कब न पढ़ा, अब तो नई चाहिए, और सब ख़रीद चुके

दर्ज़े में जितने हैं, केवल मैं बाक़ी हूँ ।
बुआ ने कहा : अभी वही पढ़ो, फिर पैसे दूंगी, कुछ दिन बीते,

ले जाना नई लेना,
मैंने कहा : बुआ, यह कैसे हो सकता है, वह दर्ज़ा पास कर चुका हूँ मैं,

अब नई लेनी हैं, किताबें पुरानी बेकार हैं
बुआ ने कहा : किसी लड़के से मांग लो ना, तुमसे जो आगे पढ़ता रहा हो,

वह दर्ज़ा पास कर चुका हो अब, जिसमें तुम नए-नए आए हो,
मैंने चिढ़ कर कहा : बुआ, वे किताबें अब बदल गईं ।

बुआ ने पूछा : क्यों ?

क्या जानूँ– मैंने कहा,
अर्ध स्वगत बुआ बोलीं– सभी पैसे कमा रहे हैं,

मैंने पूछा : बुआ, क्या कहती हो, दाम मुझे देती हो,
बुआ ने कहा : आज मदरसे तुम चले जाओ, मास्टर से कह देना :

पैसे आज नहीं मिले, कल तक मिल जाएंगे

तब तक माँ आई और उसने कहा : रोज़-रोज़ कहती हूँ,

पढ़-लिख कर क्या होगा, पढ़ना अब बन्द करो इसका, घर काम करे,

पढ़ना हमारे नहीं सहता, पर बात मेरी कौन यहाँ सुनता है ।
रान-परोसी कहते हैं, लड़का इन्हें भारी है, इसी राह खो रहे हैं ।

बुआ ने मुझ से कहा चिल्ला कर : जाओ तुम, नहीं तुम्हें देर होगी

सब चले गए होंगे ।

लेकिन मैं बुआ के पीछे जा खड़ा हुआ,

पूरी बात सुनना मैं चाहता था, गया नहीं ।

बुआ ने कहा : धन्य बुद्धि, जो नहीं पढ़ते, वे सब क्या अमर हैं ?

माँ ने कहा : देखते हुए मक्खी लीलते नहीं बनता,

पढ़-लिख कर ही आख़िर फलाने विक्षिप्त हुए,
पढ़ते-लिखते ही तीन-चार जने मर गए,
तुमको तो जैसे कहाँ पत्ता भी नहीं खड़का,
गिरते हुए थोड़ा भी
बुआ ने का : दुलहिन (माँ को वे यही कहा करती थीं ) इस बच्चे को

मैंने श्रद्धा से, प्रेम से, निष्ठा से,
विद्या को दान कर दिया है,
जानबूझ कर दान कैसे फेर लूँ,
ऎसा कभी नहीं हुआ–
विद्या माता ही अब इसको निरखें-परखें ।
रक्षा और पालन-पोषण करें !

हाथों के दिन – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Haathon Ke Din”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “हाथों के दिन”

Trilochan

हाथों के दिन आयेंगे, कब आयेंगे,
यह तो कोई नहीं बताता, करने वाले
जहाँ कहीं भी देखा अब तक डरने वाले
मिलते हैं। सुख की रोटी कब खायेंगे,
सुख से कब सोयेंगे, उस को कब पायेंगे,
जिसको पाने की इच्छा है, हरने वाले,
हर हर कर अपना-अपना घर भरने वाले,
कहाँ नहीं हैं। हाथ कहाँ से क्या लायेंगे।

हाथ कहाँ हैं,वंचक हाथों के चक्के में
बंधक हैं,बँधुए कहलाते हैं, धरती है
निर्मम,पेट पले कैसे इस उस मुखड़े
की सुननी पड़ जाती है, धौंसौं के धक्के में
कौन जिए।जिन साँसों में आया करती है
भाषा,किस को चिन्ता है उसके दुखड़ों की।

Haathon Ke Din 

Haathon ke din aayenge, kab aayenge,
Yah to koii nahiin bataataa, karane vaale
Jahaan kahiin bhii dekhaa ab tak darane vaale
Milate hain. sukh kii rotii kab khaayenge,
Sukh se kab soyenge, us ko kab paayenge,
Jisako paane kii ichchhaa hai, harane vaale,
Har har kar apanaa-apanaa ghar bharane vaale,
Kahaan nahiin hain. haath kahaan se kyaa laayenge.

Haath kahaan hain,vanchak haathon ke chakke men
Bandhak hain,bandhue kahalaate hain, dharatii hai
Nirmam,pet pale kaise is us mukhade
Kii sunanii pad jaatii hai, dhaunsaun ke dhakke men
Kaun jie.jin saanson men aayaa karatii hai
Bhasaa, kis ko chintaa hai usake dukhadon kii.

विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Vida Kiya Tha Tab Kaha”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना”

Trilochan

विदा किया तब कहा कि यह लाना वह लाना,
ग्वैड़े आया, और हाथ दोनों हैं ख़ाली;
सजी ख़ूब थी हाट, मगर मुश्किल था पाना
पैसों बिना। “जानती हो, मुझको ख़ुशहाली

जैसे यहाँ वहाँ भी न थी”— क्या यही कह दूँ।
कितनी ठेस लगेगी उसको। अपने मन में
क्या क्या सोचे बैठी होगी । कैसे चह दूँ
बाँध बात से। ऐसे भी मनुष्य हैं जन्मे

दुनिया में, जिनको दुर्लभ है कानी कौड़ी।
प्यार उन्हें भी मिलता है, सुख का कोलाहल
उन्हें नहीं सुन पड़ता है, विपत्ति ही दौड़ी
दौड़ी उन्हें भेंटती है, करती है विह्वल।

क्या दूँ क्या दूँ क्या दूँ क्या दूँ क्या दूँ क्या दूँ
अपनी पहुँच में कहाँ, क्या है, जो मैं ला दूँ।

नगई महरा – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Nagai Mahra”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “नगई महरा”

Trilochan

गाँव वाले इधर उधर कहते थे
नगई भगताया है
सामना हो जाने पर कहते थे
नगई भगत

नगई कहार था
अपना गाँव छोड़कर
चिरानीपट्टी आ बसा
पूरब की ओर
जहाँ बाग या जंगल था
बाग में
पेड़ आम,जामुन या चिलबिल के
जंगल में मकोय, हैंस, रिसबिल की बँवरें
झाड़ियां झरबेरी की
और कई जाति की
ढ़ेरे, कटार,ढ़ाक, आछी,
बबूल और रेवाँ के
पेड़ भी जहाँ तहाँ खड़े थे

सूखे पत्ते वहाँ बहुत सारे थे
नगई ने भाड़ बैठा दिया
दिन में साँस मिलने पर
भाड़ को जगाता था
दूर दूर से भुँजानेवाले आ जाते थे
संझा के पहले ही
भाड़ बन्द होता था
नगई का परिवार
छोटा था
घरनी और एक बच्ची
बच्ची गोहनलगुई थी
घरनी सेंदुर से मिली नहीं थी
धरौवा कर लिया था

घरनी फुर्तीली थी
चुस्त काम काज में
बोल बात में हँसमुख
कभी उसका चेहरा मुरझाया हो
याद नहीं आता मुझे
बात पर बात ऐसे जड़ती थी
जहाँ समझ लड़ती थी
और ये दुर्लभ है
नगई ने गाँव के
तीन-चार घरों का
पानी थाम लिया था
कभी वह भरता था
कभी घरनी भरती थी
कुछ खेत मिले थे इसके लिए
और घर घर से
कलेवा मिल जाता था
नगई नहीं खाता था
माँ-बेटी खाकर कुछ करती थी

पूरा परिवार मैंने देखा
पैरों पैरों है
हाथों ने काम कोई लिया, किया
हो जाने का ही काम
हाथों में आता था
रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बांध भी बनाता था
कहता था, दैव ने मुँह चीर दिया है
उसमें कुछ देने को हाथ तो चलाना है
मैने इस घर में
टुन्न पुन्न नहीं देखी
घरनी को महरिन मैं कहता था
मैं ही नहीं कोई मुँह-मुँह देखे
क्योंकि नगई महरा थे
सबके लिए
केवल बड़े-बूढ़े बखरीवाले
नगई बुलाते थे
कभी नगई कभी महरा
जो भी जबान पर चढ़ गया
कहने की झोंक में

नगई को बैठने और उठने का
बोलने-बतियाने का सहूर है
यह अनमोल बाबा कहते थे
अनमोल बाबा की आँख
इन्ही बातों पर पड़ती थी
अच्छी तरह जानता हूँ
मुझ पर जब चिढ़ते थे
कहते थे तू कैसे
बेटा बैरागी का हो गया
भलमनई की कोई चाल नहीं
नगई की चर्चा
निन्दकों को प्रिय नहीं थी
गाँव में निन्दक कम नहीं थे
कहाँ नहीं होते वे
जहाँ वृद्दि पाते हैं
खुचड़ खोज-खोजकर दिखाते हैं

बहुतों के पाँव अपनी डगर पर
निन्दा की कहीं छिपी कहीं उभरी
अढ़ुकन से ठोकर खा जाते हैं
उबेने पाँव चलना कठिन होता है
हर डग का ऊँच खाल
देखे और तोले बिना
काम नहीं चलता
अपना शरीर बेसम्हार होता है
एक दिन अपने द्वारे
इमली के पेड़ तले मैं था
घेउरा बुआ था महरिन पानी भरने आ गयी
बुआ ने बुलाया महरिन
महरिन आ गई पास
बुआ ने, अब मैं समझता हूँ,
कुछ प्यार से कुछ तिरस्कार से
कहा होगा— महरिनिया
तू दमाद के घर
क्यों बैठ गयी
महरिन का जवाब पहले का तैयार लगा
बूआ, अपनी ओर ही निगाह करो
दूसरों की बूझने से पहले अपना ही बूझना
कहीं अच्छा होता है
और वह इज्जत बचाती हुई
घर में चली गयी
छूछा जोर लेकर बाहर निकली
बिल्कुल चुप
बुआ भी चुप ही रहीं
उसके इनारे की ओर चले जाने पर
आप ही आप कहा
कौन नीच जाति के मुँह लगे.

तब मेरी उमर जैसी छोटी थी
समझ भी छोटी थी
शब्द याद रह गये
अर्थ वर्षों बाद खुला जब
समाज के पर्दे खुलने लगे
चार भाई थे—नगई, बैरागी, बित्तू
और कोई और
बैरागी को मैने देखा था जब तब
चिरानीपट्टी कभी-कभी आता था
बैरागी का बियाह महजी से हुआ था
महजी इस महरिन की कोख से जनमी थी
बैरागी-महजी के नाते से
कभी कदा नगई की चर्चा चल जाती थी

चर्चा कमजोर थी
कहारों में
किसी को छोड़कर दूसरे को कर लेना
चलता था
और अब भी चलता है
नर या नारी का बिसेख कोई नहीं था
जोड़े में जब कोई नहीं रहा
दूसरे को लाने में बाधा कुछ नहीं थी
जरा ऊँच-नीच का विचार तो यहाँ भी था
जातियों के आपसी भेद थे
कोई जाति कुछ ऊँची
कोई जाति कुछ नीची
स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न शाखा के हुए
तो मुश्किल पड़ जाती थी
लेकिन पंचायत थी
डाँड़-बाँध करती थी
जिसे मानना ही था
और फिर भोज भात चलता था
भोज भात खाया भागे नहीं
आपसी बतियाव, खेला, गाना, नाच-रंग
नाटक, तमाशा, सभी होता था
इसी समय सबके गुन खुलते थे

नगई ने अपने सगे भाई की सास को
घर में बैठाया था
उसी घर में माँ-बेटी
जेठानी-देवरानी थीं
सम्बन्धों की छीछालेदार
घर में ना हो गाँव-भर में होती थी
बाप दादों का कुटका
बछैया छोड़कर नगई ने छोड़ दिया
मँडई डाल ली चिरानीपट्टी में आकर

मैने एक दिन उधर
पेड़ों के सहारे एक मड़ई खड़ी देखी
पास ही बँसवट थी
जिसमें बहुत साँप सुने जाते थे
और कुछ कदम पर डँड़ियबा का मसान था
गाँव में गाँव से अलग छनिहर
कौन यहाँ रहता है
देखने के लिए गया
आँखें जो देखती थीं मेनेजर को बताती थीं
मुँह मेरा बन्द था

नगई ने जेंवरी बरते पूछा, पढ़ते हो
हाँ कहने को खुला
फिर नगई ने पूछा
रमायन बाँच लेते हो
हाँ अटक अटककर
सुन कर हँसा नगई खुलकर बोला
बाँचना अटक अटक कर
और इसे बूझना बूझने की बात है
मेरे कान नगई के कहन-रस में पगे
अब उसने फिर कहा
लाऊँ मैं, बाँचोगे,
ले आओ मैंने कहा
मन में गुना अब तक तो
अपने आप बाँचता था
आज किसी और के लिए मुझे बाँचना है
यहाँ नयी बात थी
और नयी बात में अनकुस होता ही है
मन हाल रहा था
बात को फैलाव से बचाने के लिए मै
नगई का नाम बार-बार दे रहा हूँ
लेकिन मुझे उस दिन
उसका नाम मालूम नहीं था
बातों से बात चली
अलगाव दूर था लगाव पास पास था
और लगाव को कोई नाम देने से
काम बहुत नहीं बनता
नाम एक निश्चित निश्चय उगाता है
अर्थ सम्बन्धों के सहारे चला करते हैं
यानि अर्थ का उदगम छिपा रह जाता है
नगई ने बेठन को खोलकर पोथी को
माथे से लगा लिया
फिर उसे खाट कि सिरहाने रखा
लोटे में पानी लेकर मुझसे कहा
चरण मुझे धोने दो
और उसने मेरे दोनें पैरों को
घुटनों तक धो दिया अच्छी तरह
फिर लोटे को माँजा धोकर पानी लिया
और कहा, चलो हाथ मुँह भी धुला दूं

मैं उठा पानी वह ढालता रहा
मैने हाथ-मुँह फरचाए
पास के मँड़हे में कुशासन एक अलग था
उसकी गर्द झाड़कर मुझे बैठने को कहा
मेरे बैठ जाने पर पोथी मुझे सौंप दी
फिर मुझे बड़े भक्ति-भाव से प्रणाम किया
कुछ हटकर हाथ जोड़कर सामने ही
भूमि पर बैठ गया

मैने पोथी खोल ली
पूछा, कहाँ पढूं
उसने कहा सुन्दरकाण्ड
मैंने साँस चैन की ली
सुन्दरकाण्ड कई बार पढ़ा था
पढने को,अर्थ कौन ढुँढता
ध्वनी अपनी मुझे अच्छी लगती थी
जहाँ-जहाँ अर्थ झलक जाता था
वहाँ आनन्द मुझे मिलता था
जनक सुता के आगे ठाढ़ भएउ कर जोरि
पढकर मैं रुका प्रति दोहे पर जैसे
वैसे ही उसने इस दोहे पर
भक्ति भाव से कहा
सियाबर रामचन्द्र की जय
फिर मुझ से कहा अब विश्राम
कुशा खण्ड पतला सा मेरी ओर करके कहा
चिह्न रख दो पोथी में
मैंने चिह्न लगाकर पोथी को बन्द किया
उसने अब पूछा था कल भी आओगे इस ओर
मैने कहा, आऊँगा
जब मैं खड़ा हुआ चलने को
उसने भक्ति भाव से मुझे फिर प्रणाम किया

मँड़हे से निकला मैं, वह भी साथ था
पूछ पड़ा, किसके लड़के हो
मैंने शिक्षा जैसी थी अलक्ष को प्रणाम किया
कहा, जगरदेवसिंह मेरे पिता थे
बैरागी बाबू, पूछा उसने
मैंने कहा, उनका यह भी नाम है
उसने कहा, अब ऐसे आदमी दिखाई नहीं पड़ते
धरम जानकर रहे धरम किया

मैं बाहर निकला तो सोचता हुआ निकला
आज जो हुआ वह केवल आज ही हुआ है
और मैंने आज के उड़ंछू शब्दों को
पकड़ पाने के लिए अपने मन को
उद्यत कर दिया
ऐसा कम होता है बहुत कम
जब शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें
बुआ से मैंने सबकुछ कहा फिर पुछा
उसका नाम क्या है
बुआ ने कहा नगई
महरिन के माथे से उबहनी लटकाए
मैंने घर जाते देखा था
उधर वही घर था
मुड़ते भी देख लिया उनको
उसी ओर
कई दिनों बाद
गया नगई की मँड़ई पर

नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखें उन हाथों का
हथवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढे पर
साफ है मैंनें कुछ पहले ही धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते है रमायन
तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतर की आँख खुली थी
सुर भी क्या कण्ठ से निकलता था
जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज
मैने कहाँ महरा
मैं तो अभी सीख रहा हूँ
नगई ने कहाँ कितने होंगे
जो जानते हैं वही कुछ सीखना है
बाबू की तपस्या का फल
तुम्हें मिला है मिलेगा
मैं इस सनेहिल असीस से
चुपाया रहा
नगई ने हाथ चलाते चलाते फिर कहा
दुनियां है दुनियां का ज्ञान है आदमी है
आदमी को क्या क्या नहीं जानना है
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
मेरे लिए समझ पाना कठिन था
पर रुक रुककर निकले बोल ये
कहीं ठहर गये थे मेरे मन में
अर्थ बहुत बाद में कुछ कुछ पाया
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोड़ती है

वर्ष बीत जाने के बाद, शायद
एक दिन नगई की ओर जा निकला
इतने जन वहाँ मैंने नहीं देखे थे
अपना कुछ काम था फिर भी में रुक गया
नगई की दृष्टि मुझ पर पड़ी
काम रोककर मेरे पास आ गया
और कहा, भात है बिरादरी को न्योता है
दिन परसों निश्चित है
आप कहाँ जाते हो
मैंने कहा काम से
उसने कहा मुझे भी बुझाव है
परसों आना
इज्ज्त मैं क्या दुंगा
फिर भी दसों नँह जोड़े
खड़ा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

मैं आगे बढ़ गया
उस दिन बडी भीड़ थी
बड़े-बड़े चूल्हे जगाये गये
जिन पर हण्डे कड़ाह चढ़े थे
कहीं भात कहीं दाल और कहीं
तरकारी पकती थी
लकड़ियों की कोई कमी नहीं थी
जंगल के बीच थे चिरानीपट्टी की बस्ती
दोने पत्तल पहले से बनाकर
ठिकाने से रखे थे
ढखुलाही कोई छोटी नहीं थी
ढाक के पेड़ ही पेड़ थे
बड़े और अच्छे पत्ते जिन पर छाये थे
जंगल में क्या कमी
जंगल जिसका हो
उससे कह कर ले लेना था
रोक टोक कोई खास नहीं थी
कई बार आ जाकर
रंग वहाँ का देखा
जो भी मिला काम से लगा मिला
ऐसे लोग भी मिले
जो करते थे कम और बोलते बहुत रहते हैं
आवाज ऊँची से ऊँची हो आती है।
ध्यान इधर उधर जाता है आसपासवालों का
कुछ लोग फिरकी से फिरते हुए
इनके पास उनके पास जाते थे
काम को देखकर बताते थे
ऐसे करो वैसे करो
मैंने सुना, एक कहाँ रहा था, कैसे भला
लेकिन सचेत पाँव कान से कुछ दूर थे
मुँह किसी और हाथ से कुछ कह रहा था

कोई दस बार पाँत बैठी थी
हर बार पत्तलें पचास ऊपर लगती थी
नगई ने तीन बीस का हिसाब रखा था
भोजन करने वाले तुष्ट थे
गाँजा, तमाखू, सुरती, बीड़ी, और पान का
प्रबन्ध था
जब जो जिसे चाहिए
जाकर ले लेता था
कुछ बूढ़े और आदर मान पाने वाले ही
अपनी जगह जमे थे
उनकी सेवा नौजवान करते थे
बार-बार यहाँ या वह पूछकर
सराहना हो रही थी
नगई के यहाँ वहाँ
बड़े लोग भी प्रबन्ध ऐसा
नहीं कर पाते
नगई पर कृपा है भगवान की
इस तरह मान दिया
भार हल्का कर दिया

पंचायत बैठी थी जाजिम पर
पीपल के नीचे
दिन दो घड़ी शेष था
कोतवाल, सिपाही और गोड़इत
जाति के ही लोग थे
बरौछीदार-चँवरदार मक्खियाँ उड़ाते थे
बैठे हुए लोगों को बचाते
हवा पट पड़ी थी इसी कारण
पंखे का प्रबन्ध था पसीना चल रहा था
और बड़े-बड़े पंखे तीन चार हाथों से
हवा को लहराते थे
मैं उभरी पीपल की सोर पर जरा हटकर
बैठा था, मेरी आँखों के लिए
पहली पंचायत थी
चौकीदार ने पुकारा
नगई और लखमनी
दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए
फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया
अपने दोस मानते हो
मानते हैं—दोनों ने साथ कहा
पूछा गया, डाँड़-बाँध तुमको मंजूर है
सिर माथे हमको मंजूर है—दोनों बोले
पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड़ है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ
बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया
धन्य हुआ
और फिर भोज हुआ
नाच और नाटक हुए.

अगर चाँद मर जाता – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Agar Chand Mar Jaata”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “अगर चाँद मर जाता”

Trilochan

अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?

खोजते सौन्दर्य नया?
देखते क्या दुनिया को?
रहते क्या, रहते हैं
जैसे मनुष्य सब?
क्या करते कविगण तब?

प्रेमियों का नया मान
उनका तन-मन होता
अथवा टकराते रहते वे सदा
चाँद से, तारों से, चातक से, चकोर से
कमल से, सागर से, सरिता से
सबसे
क्या करते कविगण तब?
आँसुओं में बूड़-बूड़
साँसों में उड़-उड़कर
मनमानी कर- धर के
क्या करते कविगण तब
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार – त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Khule Tumhare Hridya Ke Dwar Trilochan”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार”

Trilochan

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार
अपरिचित पास आओ!

आँखों में सशंक जिज्ञासा
मुक्ति कहाँ, है अभी कुहासा
जहाँ खड़े हैं, पाँव जड़े हैं
स्तम्भ शेष भय की परिभाषा
हिलो मिलो फिर एक डाल के
खिलो फूल-से, मत अलगाओ!

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार
अपरिचित पास आओ!

सबमें अपनेपन की माया
अपनेपन में जीवन आया
चंचल पवन प्राणमय बन्धन
व्योम सभी के ऊपर छाया
एक चाँदनी का मधु लेकर
एक उषा में जगो जगाओ!

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार
अपरिचित पास आओ!

झिझक छोड़ दो, जाल तोड़ दो
तज मन का जंजाल, जोड़ दो
मन से मन, जीवन से जीवन
कच्चे कल्पित पात्र फोड़ दो
साँस-साँस से, लहर-लहर से
और पास आओ लहराओ!

खुले तुम्हारे लिए हृदय के द्वार
अपरिचित पास आओ!

मैं – तुम : त्रिलोचन

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Trilochan was an eminent hindi poet who was widely popular. Read his hindi poem “Main Tum”. त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य प्रगतिशील काव्यधारा का एक स्तम्भ माना जाता है. पढ़िए उनकी लिखी एक कविता “मैं – तुम”

Trilochan

‘मैं’ सबका मैं है
वैसे ही ‘तुम’ सबका तुम है

लेकिन मैं कहाँ हूँ
कहाँ हूँ मुझे जान लेना है
तुम मेरी परेशानी
अगर नहीं जानते तो तुम्हारी हानि क्या
अगर जान जाओगे तो उससे लाभ क्या
हानि, लाभ वैसे दो शब्द हैं
जिनका हाट-बाट और घर-घर में चलन है
तुम अपने में मगन
अपनों को देखते हो
इसी से तुम्हारा मैं
जो तुम्हारा जाना-पहचाना तुम होता है
अपना कर लेता है

लेकिन मैं कहाँ हूँ
मैं तुम्हारा अपना तुम नहीं
तभी दृष्टि तुम बचाते हुए
कहीं और जाते हो
पाँवों में जल्दी मैं देखता हूँ
अनजाने इतना हो जाता है
तुम कहीं जाते हो
कोई काम करते हो
किसी से दो बातें सुनते हो
दो बातें कहते हो
कोई ठान ठानते हो
चिन्ता में पड़ते हो
कोई ख़ुशी आती है
कोई दुःख होता है
मैं भी आसपास कहीं होता हूँ
और तुम्हारी साँसों की भाषा समझता हूँ
शुद्ध रूप देता हूँ, कवि हूँ
तुम भी यह जानते हो कवि क्या होता है
वह कैसे खाता है
कैसे संसार उसका चलता है
तुमको मालूम नहीं
फ़ुर्सत भी तुम्हें कहाँ यह सब मालूम करो
होगा कवि कोई कहीं
मिहनत तुम्हारी अकेले की नहीं है
मेरा भी साझा है, हाथ है
और मनबहलावा तुम्हारा अकेला नहीं
मेरा भी साथ है
और जो तुम्हारा भोग होता है
मेरा भी होता है
और तुमने कब सोचा वह केवल तुम्हीं हो
जिससे मेरा मेरे मन का सम्वाद है
कभी पूछकर देखो मुझसे
मैं कहाँ हूँ
मैं तुम्हारे खेत में तुम्हारे साथ रहता हूँ
कभी लू चलती है, कभी वर्षा आती है, कभी जाड़ा होता है
तुम्हें कभी बैठा भी पाया तो ज़रा देर
कभी चिलम चढ़ा ली, कभी बीड़ी सुलगायी
फिर कुदाल या खुरपा या हल की मुठिया को लिए हुए
कभी अपने-आप कभी और कई हाथों को लगाकर
काम किया करते हो

जब तुम किसी बड़े या छोटे कारख़ाने में
कभी काम करते हो किसी भी पद पर
तब मैं तुम्हारे इस काम का महत्त्व ख़ूब जानता हूँ
और यह भी जानता हूँ – मानव की सभ्यता
तुम्हारे ही खुरदरे हाथों में नया रूप पाती है।
और यह नया रूप आनेवाले कल के किसी नये रूप की
भूमिका है और यह भूमिका भविष्य का
संविधान बनती है, वैसे ही जैसे समाज सारा आज का
आदिम समाज का विकास है,
आदिम समाज की अनेक बातें आज भी क्या नहीं हैं
व्यक्ति या समूह या समाज में
कहीं किसी जनपद में, राज्य में, राष्ट्र में
और फिर राष्ट्रों में
तुम्हें इतना और यह सब सोचने-समझने की
चिन्ता नहीं, चिन्ता का भार तो तुमने कहीं और
डाल दिया है और इस भार को उठानेवाले
दूसरे हैं जो तुम्हारे और मेरे बीच
अपने आप आ जाते हैं, आया करते हैं

मैं तुम से, तुम्हीं से, बात किया करता हूँ
और यह बात मेरी कविता है

कविता में अपने साथ देखो मैं कहाँ हूँ
नया मोड़ सामने है, जीवन जिस ओर चले उस पर है
अब पुरानी दीवारें गिरती हैं और नयी उठती हैं
इनको बनानेवाले हाथ मुस्कराते हैं, गीत जो उभर आया
उसे गुनगुनाते हैं, यही हाथ और कहीं कितने ही हाथों के साथ
कहीं सड़कें बनाते हैं, नगर बसाते हैं और ऊबड़खाबड़ को
पट पर कर देते हैं जिससे जो पैर अभी नन्हे-नन्हे
और कोमल-कोमल हैं, जब सयाने हो जाएँ अपनी राह
दृढ़ता से तय करें, चुपचाप सिर डाले कहीं बैठ जाने का
समय अब नहीं है, रोज़ी हाथ-पाँव मारा जाए तब
चलती है नियम से, ऐसा ही सिलसिला है

मानव समाज नर-नारी के हाथों से
व्यक्तियों, समूहों, वर्गों, देशों का रूप लिया करता है
व्यक्ति ही तो मूल है यहाँ वहाँ जो कुछ है
लेकिन व्यक्ति कितना असहाय है अकेले में
मेले में सभी कितने अलग-अलग होते हैं
परिवार में भी राग व्यक्ति का अलगाया रहता है
जहाँ लोग एक-दूसरे के पास, बहुत पास होते हैं
एक-दूसरे को ख़ूब जानते-पहचानते हैं, एक-दूसरे की
बात-व्यवहार देखते हैं, अपना मत रखते हैं
कभी-कभी ऐसी घनिष्ठता स्वतन्त्रता को आदर दे तो कितना
द्वन्द्व फिर दिखायी देगा किसी को
हमारी स्वतन्त्रता औरों की स्वतन्त्रता के साथ है

भूलें हो जाती हैं भूलें ये अगर यह ठीक हो जाया करें
किसी तरह कर दी जाएँ तो सारी पृथिवी पर
शान्ति खेलने लगे, शान्ति-पाठ जीवन का सत्य हो
नहीं तो पाठ पाठ ही रहेगा, कभी शान्ति का
स्वरूप नहीं दिखेगा, यही तो एक बाधा है
शान्ति के लिए लड़ाई होती है लड़नेवाले कहते हैं

मैं बहुत अलग कहीं और हूँ
खोज लो मैं कहाँ हूँ

इस पृथिवी की रक्षा मानव का अपना कर्तव्य है
इसकी वनस्पतियाँ, चिड़ियाँ और जीव-जन्तु
उसके सहयात्री हैं, इसी तरह जलवायु और सारा आकाश
अपनी-अपनी रक्षा मानव से चाहते हैं
उनकी इस रक्षा में मानवता की भी तो रक्षा है
नहीं, सर्वनाश अधिक दूर नहीं
दिन-रात प्रातः-सन्ध्या कितने अलग-अलग रूपों में
आते हैं, कोई इन्हें देखे या अनदेखा कर जाए,
इनकी आपत्ति का पता नहीं चलता
मानव का सारा सौन्दर्य-बोध जब विकास करता है
तब इनका अपना क्या योगदान रहता है
आँखें ही इसे देख सकती हैं
मैं उसी समग्रता को देखने का आदी हूँ
खण्ड में समग्र नहीं आता, नहीं आ पाता
खण्ड सामने हो तो अखण्ड का महत्त्व क्या
अच्छी-अच्छी बातों के अर्थ बदल जाते हैं
मन किसी का बदल जाए तो सबकुछ एकाएक
उलटपुलट जाता है
मैं सबके साथ हूँ, अलग-अलग सबका हूँ
मैं सब का अपना हूँ, सब मेरे अपने हैं
मुझे शब्द-शब्द में देखो
मैं कहाँ हूँ…