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एक ही मुश्दा सुभो लाती है – जॉन एलिया

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Ek hi mushdaa subho laati hai (एक ही मुश्दा सुभो लाती है) –  जॉन एलिया की बेहद लोकप्रिय ग़ज़ल पढ़िए. तान्हाई और अकेलेपन के दर्द को बयां करती ये शायरी, खुद उनकी ही आवाज़ में सुनिए नीचे दिए गए लिंक में.

Ek hi mushdaa subho laati hai (एक ही मुश्दा सुभो लाती है)

एक ही मुश्दा सुभो लाती है
ज़हन में धूप फैल जाती है

सोचता हूँ के तेरी याद आखिर
अब किसे रात भर जगाती है

फर्श पर कागज़ो से फिरते है
मेज़ पर गर्द जमती जाती है

मैं भी इज़न-ए-नवागरी चाहूँ
बेदिली भी तो नब्ज़ हिलाती है

आप अपने से हम सुखन रहना
हमनशी सांस फूल जाती है

आज एक बात तो बताओ मुझे
ज़िन्दगी ख्वाब क्यो दिखाती है

क्या सितम है कि अब तेरी सूरत
गौर करने पर याद आती है

कौन इस घर की देख भाल करे
रोज़ एक चीज़ टूट जाती है

Ek Hi Mushdaa Subho Laati Hai (English Font)

Ek hi mushdaa subho laati hai
Zehan men dhoop fail jaati hai

Sochataa hoon ke teri yaad aakhir
Ab kise raat bhar jagaati hai

Farsh par kaagajo se firate hai
Mej par gard jamati jaati hai

Main bhi ijn-e-navaagari chaahoon
Bedili bhi to nabj hilaati hai

Aap apane se ham sukhan rahanaa
Hamanashi saans fool jaati hai

Aaj ek baat to bataao mujhe
Zindagii khvaab kyo dikhaati hai

Kyaa sitam hai ki ab terii soorat
Gaur karane par yaad aati hai

Kaun is ghar kii dekh bhaal kare
Roj ek chiij TooT jaatii hayo

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अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे – ज़ौक़

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Ab to ghabaraa ke ye kahate(अब तो घबरा के ये कहते हैं) – ज़ौक़ की मशहूर ग़ज़ल आज पढ़िए.  नीचे इसी ग़ज़ल का एक विडियो लिंक दिया गया है, जिसमें आप जगजीत सिंह जी की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुन सकेंगे.

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे - ज़ौक़

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जायेंगे

सामने-चश्मे-गुहरबार के, कह दो, दरिया
चढ़ के अगर आये तो नज़रों से उतर जायेंगे

ख़ाली ऐ चारागरों होंगे बहुत मरहमदान
पर मेरे ज़ख्म नहीं ऐसे कि भर जायेंगे

पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक हम क्योंकर
पहले जब तक न दो-आलम से गुज़र जायेंगे

आग दोजख़ की भी हो आयेगी पानी-पानी
जब ये आसी अरक़-ए-शर्म से तर जायेंगे

हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जायेंगे

रुख़े-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम
मेहरो-मह नज़रों से यारों के उतर जायेंगे

‘ज़ौक़’ जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उनको मैख़ाने में ले लाओ, सँवर जायेंगे

Ab To Ghabaraa Ke Ye Kahate

Ab to ghabaraa ke ye kahate hain ki mar jaayenge
Mar gaye par n lagaa jii to kidhar jaayenge

Saamane-chashme-guharabaar ke, kah do, dariyaa
Chadh ke agar aaye to najron se utar jaayenge

Khaalii ai chaaraagaron honge bahut marahamadaan
Par mere jkhm nahiin aise ki bhar jaayenge

Pahunchenge rahagujr-e-yaar talak ham kyonkar
Pahale jab tak n do-aalam se gujr jaayenge

Aag dojakh kii bhii ho aayegii paani-paani
Jab ye aasii arak-e-sharm se tar jaayenge

Hum nahiin vah jo karen khoon kaa daavaa tujhapar
Balki poochhegaa khudaa bhii to mukar jaayenge

Rukhe-raushan se nakaab apane ulaT dekho tum
Meharo-mah najron se yaaron ke utar jaayenge

‘Zauk’ jo madarase ke bigade hue hain mullaa
Unako maikhaane men le laao, sanvar jaayenge

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इन्साइट – जगजीत सिंह

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Insight Album is an Album released by Jagjit Singh in the year 1993. These songs were composed by him and the songs were written by Nida Fazli.

इन्साइट - जगजीत सिंह | Insight - Jagjit Singh

Album: Insight
Music: Jagjit Singh
Singer: Jagjit Singh
Lyrics: Nida Fazli

Muh Ki Baat Sune Har Koi

मुहँ की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के बाजारों में ख़ामोशी पहचाने कौन

सदियों सदियों वही तमाशा, रस्ता रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं, खो जाता है जाने कौन !

वो मेरा आईना है और मैं उसकी परछाई हूँ
मेरे घर में रहता है, मुझ जैसा ही जाने कौन

किरण किरण अलसाता सूरज, पलक पलक खुलती नींद
धीमे धीमे बिखर रहा है, ज़र्रा ज़र्रा जाने कौन

मुहँ की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के बाजारों में ख़ामोशी पहचाने कौन

Chand Se Phool Se 

चाँद से फूल से या मेरी जुबां से सुनिए,
हर तरफ आप का किसा जहां से सुनिए,

सब को आता है दुनिया को सता कर जीना,
ज़िंदगी क्या मुहब्बत की दुआ से सुनिए,

मेरी आवाज़ पर्दा मेरे चहरे का,
मैं हूँ खामोश जहां मुझको वहां से सुनिए,

क्या ज़रूरी है की हर पर्दा उठाया जाए,
मेरे हालात अपने अपने मकान से सुनिए..

Jeevan Kya Hai Chalta Phirta 

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलोना है
दो आँखो मे एक से हसँना एक से रोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन जीवन जीने का समझौता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अन्धेरी भोर सुहानी यही ज़माना है
हर चादर मे दुख का ताना सुख का बाना है
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है

Badne Na Apne Aap Ko

बदला ना अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

ढुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन मे नाराज़गी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे दुर ही रहे

गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो
जिसमे खिले है फुल वो डाली हरी रहे

अपना गम ले के कही और ना जाया जाये
घर मे बिखरी हुई चीजो को सजाया जाये

जिन चिरागो को हवाओ का कोई खौफ़ नही
ऊन चिरागो को हवाओ से बचाया जाये

बाग मे जाने के आदाब हुआ करते है
किसी तित्ली को न फूलो से उडाया जाये

घर से मस्जिद है बहुत दुर चलो यू कर ले
किसी रोते हुये बच्चे को हसँया जाये

Listen this Album Songs on – Spotify, Jio Saavn, Youtube Music.

हम तो बचपन में भी अकेले थे – जावेद अख़्तर

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Hum To Bachpan Mein Bhi Akele The (हम तो बचपन में भी अकेले थे) – जावेद अख्तर की ग़ज़ल सुनिए. ये ग़ज़ल उनकी किताब तरकश से लिया गया है. बचपन की हसरतों और मजबूरीयों को बयां करती एक ग़ज़ल.

हम तो बचपन में भी अकेले थे - जावेद अख़्तर

हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे

थीं सजी हसरतें दूकानों पर
ज़िन्दगी के अजीब मेले थे

ख़ुदकुशी क्या दुःखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे

ज़हनो-दिल आज भूखे मरते हैं
उन दिनों हमने फ़ाक़े झेले थे

Hum To Bachpan Mein Bhi Akele The (English Font)

Hum to bachapan men bhii akele the
Sirf dil kii galii men khele the

Ik taraf morche the palakon ke
Ik taraf aansuon ke rele the

Thiin sajii hasaraten dookaanon par
Zindagii ke ajiib mele the

Khudakushii kyaa duHkhon kaa hal banatii
Maut ke apane sau jhamele the

Jhano-dil aaj bhookhe marate hain
Un dinon hamane faake jhele the

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ यह कैसी तन्हाई है – जॉन एलिया

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जॉन एलिया की ग़ज़ल “तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ” पढ़िए. इस ग़ज़ल की एक विडियो भी इस पोस्ट के साथ दिया जा रहा है, जिसे गाया है कविता सेठ ने. 

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ यह कैसी तन्हाई है
तेरे साथ तेरी याद आई, क्या तू सचमुच आई है

शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का
मुझ को देखते ही जब उन की अँगड़ाई शरमाई है

उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रफ़ाक़ात का एहसास
जब उस के मलबूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है

हुस्न से अर्ज़ ए शौक़ न करना हुस्न को ज़ाक पहुँचाना है
हम ने अर्ज़ ए शौक़ न कर के हुस्न को ज़ाक पहुँचाई है

हम को और तो कुछ नहीं सूझा अलबत्ता उस के दिल में
सोज़ ए रक़बत पैदा कर के उस की नींद उड़ाई है

हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे
पागल कुछ तो सोच यह तू ने कैसी शक्ल बनाई है

इश्क़ ए पैचान की संदल पर जाने किस दिन बेल चढ़े
क्यारी में पानी ठहरा है दीवारों पर काई है

हुस्न के जाने कितने चेहरे हुस्न के जाने कितने नाम
इश्क़ का पैशा हुस्न परस्ती इश्क़ बड़ा हरजाई है

आज बहुत दिन बाद मैं अपने कमरे तक आ निकला था
ज्यों ही दरवाज़ा खोला है उस की खुश्बू आई है

एक तो इतना हब्स है फिर मैं साँसें रोके बैठा हूँ
वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है

Tu bhi chup hai main bhi chup hun – Jaun Elia

Tu bhi chup hai maib bhi chup hun ye kaisī tanhā.ī hai
Tere saath tirī yaad aa.ī kyā tū sach-much aa.ī hai

Shāyad vo din pahlā din thā palkeñ bojhal hone kā
Mujh ko dekhte hī jab us kī añgḌā.ī sharmā.ī hai

Us din pahlī baar huā thā mujh ko rifāqat kā ehsās
Jab us ke malbūs kī ḳhushbū ghar pahuñchāne aai hai

Husn se arz-e-shauq na karnā husn ko zak pahuñchānā hai
Hum ne arz-e-shauq na kar ke husn ko zak pahuñchāi hai

Hum ko aur to kuchh nahīñ sūjhā albatta us ke dil meñ
Soz-e-raqābat paidā kar ke us kī niiñd uḌaai hai

Hum donoñ mil kar bhī diloñ kī tanhai meñ bhaTkeñge
Pagal kuchh to soch ye tū ne kaisī shakl banāī hai

Ishq-e-pechāñ kī sandal par jaane kis din bel chaḌhe
Kyārī meñ paanī Thahrā hai dīvāroñ par kaaī hai

Husn ke jaane kitne chehre husn ke jaane kitne naam
Ishq kā pesha husn-parastī ishq baḌā harjāī hai

Aaj bahut din ba.ad maiñ apne kamre tak aa niklā thā
Juuñ hī darvāza kholā hai us kī ḳhushbū aai hai

Ek to itnā habs hai phir maiñ sāñseñ roke baiThā hun
Vīrānī ne jhāḌū de ke ghar meñ dhuul uḌaai hai

कल चौंदहवीं की रात थी – इब्ने इंशा

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Kal Chaudhvin Ki Raat Thi Lyrics (कल चौदवीं की रात थी गाने के लिरिक्स) – यह एक बेहतरीन और बहुचर्चित ग़ज़ल है जिसे मशहूर शायर “इब्ने इंशा” ने लिखा है. इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने अपनी आवाज़ में भी गाया है, जिसका लिंक और ऑडियो डिस्क्रिप्शन नीचे दिया गया है –

कल चौंदहवीं की रात थी - इब्ने इंशा

Song Credits:
Song: Kal Chaudhvin Ki Raat Thi
Album: Duniya Jise Kahte Hain
Artist: Jagjit Singh
Music Director: Jagjit Singh

Kal Chaudhvin Ki Raat Thi Lyrics

कल चौंदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

हम भी वहीं मौजूद थे हम से भी सब पूछा किए
हम हँस दिए हम चुप रहे मज़ूंर था पर्दा तिरा

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलें
हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तिरा

हम और रस्म-ए-बंदगी आशुफ़्तगी उफ़्तादगी
एहसान है क्या क्या तिरा ऐ हुस्न-ए-बे-परवा तिरा

दो अश्क जाने किस लिए पल्कों पे आ कर टिक गए
अल्ताफ़ की बारिश तिरी इकराम का दरिया तिरा

ऐ बे-दरीग़ ओ बे-अमाँ हम ने कभी की है फ़ुग़ाँ
हम को तिरी वहशत सही हम को सही सौदा तिरा

हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र
रस्ता कभी रोका तिरा दामन कभी थामा तिरा

हाँ हाँ तिरी सूरत हसीं लेकिन तू ऐसा भी नहीं
इस शख़्स के अशआर से शोहरा हुआ क्या क्या तिरा

बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक़ तिरा रूस्वा तिरा शाइर तिरा ‘इंशा’ तिरा

Kal Chaudhvin Ki Raat Thi Lyrics (English Font)

Kal chaudhvin ki raat thi shab bhar rahaa charchaa teraa.
Kuchh ne kahaa ye chaand hai kuchh ne kahaa cheharaa teraa.

Hum bhii vahiin maujood the, ham se bhii sab poochhaa kie,
Hum hans die, ham chup rahe, manjoor thaa paradaa teraa.

Is shahar men kis se milen ham se to chhooTii mahiflen,
Har shakhs teraa naam le, har shakhs diivaanaa teraa.

Kooche ko tere chhoD kar jogii hii ban jaaen magar,
Jangal tere, parvat tere, bastii terii, saharaa teraa.

Too bevafaa too meharabaan ham aur tujh se bad-gumaan,
Hum ne to poochhaa thaa jraa ye vakt kyoon Thaharaa teraa.

Hum par ye sakhtii kii najr ham hain fkiir-e-rahagujr,
Rastaa kabhii rokaa teraa daaman kabhii thaamaa teraa.

Do ashk jaane kis lie, palakon pe aa kar Tik gae,
Altaaf kii baarish terii akraam kaa dariyaa teraa.

Haan haan, terii soorat hansii, lekin too aisaa bhii nahiin,
Is shakhs ke ash‍aar se, shoharaa huaa kyaa-kyaa teraa.

Beshak, usii kaa doS hai, kahataa nahiin khaamosh hai,
Too aap kar aisii davaa biimaar ho achchhaa teraa.

Bedard, sunanii ho to chal, kahataa hai kyaa achchhii gjl,
Aashik teraa, rusavaa teraa, shaayar teraa, ‘inshaa’ teraa

इस गाने को जगजीत सिंह जी की आवाज़ में सुनिए – 

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दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था – वज़ीर आग़ा

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Din Dhal Chuka Tha Ghazal – Read the beautiful piece of ghazal by Dr. Wazir Agha.

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था - वज़ीर आग़ा

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था
सारा लहू बदन का रवाँ खिष्ट-ओ-पर में था

हद-ए-उफ़क़ पे शाम थी ख़ेमे में मुंतज़र
आँसू का इक पहाड़-सा हाइल नज़र में था

जाते कहाँ कि रात की बाहें थीं मुश्त-इल
छुपते कहाँ कि सारा जहाँ अपने घर में था

लो वो भी नर्म रेत के टीले में ढल गया
कल तक जो एक कोह -ए-गिराँ रहगुज़र में था

उतरा था वहशी चिड़ियों का लश्कर ज़मीन पर
फिर इक भी नर्म पात न सारे शहर में था

पागल-सी इक सदा किसी उजड़े मकाँ में थी
खिड़की में इक चिराग़ भरी दोपहर में था

उस का बदन था ख़ून की हिद्दत से शोला-फ़िश
सूरज का इक गुलाब-सा तिश्त-ए-सहर में था

Din Dhal Chuka Tha Ghazal (English Font)

Din dhal chukaa thaa aur parindaa safr men thaa
Saaraa lahoo badan kaa ravaan khist-o-par men thaa

Had-e-ufk pe shaam thii kheme men muntajr
Aansoo kaa ik pahaad-saa haail najr men thaa

Jaate kahaan ki raat kii baahen thiin mushtil
Chhupate kahaan ki saaraa jahaan apane ghar men thaa

Lo vo bhii narm ret ke tiile men dhal gayaa
Kal tak jo ek koh -e-giraan rahagujr men thaa

Utaraa thaa vahashii chidiyon kaa lashkar jmiin par
Fir ik bhii narm paat n saare shahar men thaa

Paagal-sii ik sadaa kisii ujade makaan men thii
Khidkii men ik chiraag bharii dopahar men thaa

Us kaa badan thaa khoon kii hiddat se sholaa-fish
Sooraj kaa ik gulaab-saa tisht-e-sahar men thaa

‘इंशा’ जी उठो अब कूच करो – इब्ने इंशा

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Inshaa Ji Utho Ab Kuch Karo – Beautiful Ghazal by Ibne Insha with the ghazal being sung by Amanat Ali Khan. Video given below: एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़िए, इब्ने इंशा का लिखा हुआ. इस ग़ज़ल को आमानत अली ने अपनी आवाज़ में गाया है.

‘इंशा’ जी उठो अब कूच करो - इब्ने इंशा

‘इंशा’ जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या

इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली का फैलाना क्या

शब बीती चाँद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में
क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या

फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो ये एक घड़ी
जो दिल में है लब पर आने दो शरमाना क्या घबराना क्या

उस रोज़ जो उन को देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है
उस रोज़ जो उन से बात हुई वो बात भी थी अफ़्साना क्या

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें
जिसे देख सकें पर छू न सकें वौ दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या

उस को भी जला दुखते हुए मन को इक शोला लाल भबूका बन
यूँ आँसू बन बह जाना क्या यूँ माटी में मिल जाना क्या

जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूँ बन में न जा बिसराम करे
दीवानों की सी बात करे तो और करे दीवाना क्या

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तेरी ख़ुश्बू का पता करती है – परवीन शाकिर

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परवीन शाकिर का की ये ग़ज़ल एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है. नीचे ऑडियो लिंक भी है जिसमे इस ग़ज़ल को आवाज़ दिया है रूप कुमार राठोड ने.

तेरी ख़ुश्बू का पता करती है - परवीन शाकिर

तेरी ख़ुश्बू का पता करती है

तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
मुझ पे एहसान हवा करती है

शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तगू तुझ से रहा करती है

दिल को उस राह पे चलना ही नहीं
जो मुझे तुझ से जुदा करती है

ज़िन्दगी मेरी थी लेकिन अब तो
तेरे कहने में रहा करती है

उस ने देखा ही नहीं वर्ना ये आँख
दिल का एहवाल कहा करती है

बेनियाज़-ए-काफ़-ए-दरिया अन्गुश्त
रेत पर नाम लिखा करती है

शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है

मुझ से भी उस का है वैसा ही सुलूक
हाल जो तेरा अन करती है

दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
बात कुछ और हुआ करती है

अब्र बरसे तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है

मसला जब भी उठा चिराग़ों का
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

  • Listen to this Ghazal on – Gaana.

चांदी जैसा रंग है तेरा , सोने जैसे बाल – पंकज उधास

Chandi Jaisa Rang Hai Tera Lyrics (चांदी जैसा रंग है तेरा) – The ghazal Chandi Jaisa Rang Hai Tera is from Pankaj Udhas Jashn, and is a another gem of a song. The song lyrics has been penned by Mumtaz Rasheed.

Title : चांदी जैसा रंग है तेरा – Chaandi jaisa rang hai tera Lyrics
Album : Jashn
Music Director : Pankaj Udhas
Singer : Pankaj Udhas
Lyricists :Mumtaz Rasheed

Chandi Jaisa Rang Hai Tera Lyrics

चांदी जैसा रंग है तेरा , सोने जैसे बाल
एक तू ही धनवान है गोरी , बाकी सब कंगाल

जिस रस्ते से तू गुजरे , वो फूलों से भर जाये
तेरे पैर की कोमल आहट सोते भाग जगाये
जो पत्थर छु ले गोरी तू वो हीरा बन जाये
तू जिसको मिल जाये वो हो जाये मालामाल
एक तू ही धनवान है गोरी , बाकी सब कंगाल

जो बे -रंग हो उस पर क्या क्या रंग जमाते लोग
तू नादाँ न जाने कैसे रूप चुराते लोग
नज़रें भर भर देखें तुझको आते जाते लोग
छैल छबीली रानी थोडा घूंघट और निकाल
एक तू ही धनवान है गोरी , बाकी सब कंगाल

धनक घटा कलियाँ और तारे सब हैं तेरा रूप
ग़ज़लें हों या गीत हों मेरे सब में तेरा रूप
यूँही चमकती रहे हमेशा तेरे हुस्न की धुप
तुझे नज़र न लगे किसी की जिए हजारों साल
एक तूही धनवान है गोरी , बाकी सब कंगाल

चांदी जैसा रंग है तेरा , सोने जैसे बाल
एक तू ही धनवान है गोरी , बाकी सब कंगाल

Chandi Jaisa Rang Hai Tera Lyrics in English Font

Chandi jaisa rang hai tera, sone jaise baal
Ek tuhi dhanvaan hai gori, baaki sub kangaal

Jis raste se tu guzre, wo phoolon se bhar jaye
Tere pair ki komal aahat sote bhaag jagaye
Jo patthar choo le gori tu wo heera ban jaye
Tu jisko mil jaye wo ho jaye malamal
Ek tuhi dhanvaan hai gori, baaki sub kangaal

Jo be-rang ho us par kya kya rang jamate log
Tu naadaan na jane kaise roop churate log
Nazaren bhar bhar dekhen tujhko aate jaate log
Chail chabeeli rani thoda ghoonghat aur nikaal
Ek tuhi dhanvaan hai gori, baaki sub kangaal

Dhanak ghata kaliyan aur tare sub hain tere roop
Ghazalen hon ya geet hon mere sub mein tera roop
Yunhi chamakti rahe hamesha tere husn ki dhoop
Tujhe nazar na lage kisi ki jiye hazaron saal
Ek tuhi dhanvaan hai gori, baaki sub kangaal

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