Ajnabee Raaston Par | Poem by Deepti Naval | अजनबी रास्तों पर | दीप्ति नवल

Ajnabee Raaston Par | Poem by Deepti Naval | अजनबी रास्तों पर | दीप्ति नवल

अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें


अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक


तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें


चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।

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