कुछ अशआर नज़र लखनवी के

अभी मरना बहुत दुश्वार है ग़म की कशाकश से
अदा हो जायेगा यह फ़र्ज़ बी फ़ुरसत अगर होगी

मुआफ़ ऐ हमनशीं! गर आह कोई लब पै आ जाए
तबीयत रफ़्ता-रफ़्ता ख़ूगरे-दर्दे-जिगर होगी

***

कोई मुझ सा मुस्तहके़-रहमो-ग़मख़्वारी नहीं
सौ मरज़ है और बज़ाहिर कोई बीमारी नहीं

इश्क़ की नाकामियों ने इस तरह खींचा है तूल
मेरे ग़मख़्वारों को अब चाराये-ग़मख़्वारी नहीं

***

सुन लो कि रंगे-महफ़िल कुछ मौतबर नहीं है
है इक ज़बान गोया, शमये-सहर नहीं है

मुद्दत से ढूंढ़ता हूँ मिलता मगर नहीं है
वो इक सकूने-ख़ातिर जो बेश्तर नहीं है

***

मेरी सूरत देखकर क्यों तुमने ठंड़ी साँस ली?
बेकसों पर रहम—आईने-सितमगारी नहीं

हर तरफ़ से यह सदा आती है मुल्के-हुस्न में
“यह वो दुनिया है जहाँ रस्मे-वफ़ादारी नहीं

***

सिवादे-शामे-ग़म से रूह थर्राती है क़ालिब में
नहीं मालूम क्या होगा, जो इस शब की सहर होगी

क़फ़स से छूटकर पहुँचे न हम, दीवारे-गुलशन तक
रसाई आशियाँ तक किस तरह बेबालो-पर होगी

फ़क़त इक साँस बाक़ी है, मरीज़े-हिज्र के तन में
ये काँटा भी निकल जाये तो राहत से बसर होगी

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