कह-मुकरियाँ – अमीर खुसरो और भारतेन्दु हरिश्चंद्र

कह मुकरी एक प्रकार की कविता है. यह असल में दो सखियों के बीच का संवाद है. कह मुकरी  का अर्थ है कुछ कहकर उससे मुकर जाना.  कह मुकरी कविता की विधा की शुरुआत आमिर खुसरो ने की थी.  इस कविता में शुरुआत की पंक्ति में कही हुई बात से मुकरकर अंत में कुछ दूसरा ही अर्थ निकलता है. आज आईये पढ़ते हैं आमिर खुसरो की ही कुछ कह-मुकरियाँ.

१. खा गया पी गया
दे गया बुत्ता
ऐ सखि साजन?
ना सखि कुत्ता!

२. लिपट लिपट के वा के सोई
छाती से छाती लगा के रोई
दांत से दांत बजे तो ताड़ा
ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!

३. रात समय वह मेरे आवे
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!

४. नंगे पाँव फिरन नहिं देत
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!

५. ऊंची अटारी पलंग बिछायो
मैं सोई मेरे सिर पर आयो
खुल गई अंखियां भयी आनंद
ऐ सखि साजन? ना सखि चांद!

६. जब माँगू तब जल भरि लावे
मेरे मन की तपन बुझावे
मन का भारी तन का छोटा
ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!

७. वो आवै तो शादी होय
उस बिन दूजा और न कोय
मीठे लागें वा के बोल
ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल!

८. बेर-बेर सोवतहिं जगावे
ना जागूँ तो काटे खावे
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की
ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी!

९. अति सुरंग है रंग रंगीले
है गुणवंत बहुत चटकीलो
राम भजन बिन कभी न सोता
ऐ सखि साजन? ना सखि तोता!

१०. आप हिले और मोहे हिलाए
वा का हिलना मोए मन भाए
हिल हिल के वो हुआ निसंखा
ऐ सखि साजन? ना सखि पंखा!

खुसरो के अलावा भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने भी कह-मुकरियाँ लिखी हैं. उनकी भी देखिये कुछ कह-मुकरियाँ. 

भीतर भीतर सब रस चूसै
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै
जाहिर बातन में अति तेज
क्यों सखि साजन ? नहिं अँगरेज!

सब गुरुजन को बुरो बतावै
अपनी खिचड़ी अलग पकावै
भीतर तत्व नहिं, झूठी तेजी
क्यों सखि साजन ? नहिं अँगरेजी!

तीन बुलाए तेरह आवैं
निज निज बिपता रोइ सुनावैं
आँखौ फूटी भरा न पेट
क्यों सखि साजन ? नहिं ग्रैजुएट!

मुँह जब लागै तब नहिं छूटै
जाति मान धरम धन लूटै
पागल करि मोहिं करे खराब
क्यों सखि साजन ? नहिं शराब!

सीटी देकर पास बुलावै
रुपया ले तो निकट बिठावै
ले भागै मोहिं खेलहिं खेल
क्यों सखि साजन ? नहिं सखि रेल!

धन लेकर कछु काम न आवै
ऊँची नीची राह दिखावै
समय पड़े पर सीधै गुंगी
क्यों सखि साजन ? नहिं सखि चुंगी!

मतलब ही की बोलै बात
राखै सदा काम की घात
डोले पहिने सुंदर समला
क्यों सखि साजन ? नहिं सखि अमला!

सुंदर बानी कहि समुझावैं
बिधवागन सों नेह बढ़ावैं
दयानिधान परम गुन-आगर
क्यों सखि साजन ? नहिं विद्यासागर!

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