दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था – वज़ीर आग़ा

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था
सारा लहू बदन का रवाँ खिष्ट-ओ-पर में था

हद-ए-उफ़क़ पे शाम थी ख़ेमे में मुंतज़र
आँसू का इक पहाड़-सा हाइल नज़र में था

जाते कहाँ कि रात की बाहें थीं मुश्त-इल
छुपते कहाँ कि सारा जहाँ अपने घर में था

लो वो भी नर्म रेत के टीले में ढल गया
कल तक जो एक कोह -ए-गिराँ रहगुज़र में था

उतरा था वहशी चिड़ियों का लश्कर ज़मीन पर
फिर इक भी नर्म पात न सारे शहर में था

पागल-सी इक सदा किसी उजड़े मकाँ में थी
खिड़की में इक चिराग़ भरी दोपहर में था

उस का बदन था ख़ून की हिद्दत से शोला-फ़िश
सूरज का इक गुलाब-सा तिश्त-ए-सहर में था

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