हिट्स ऑफ़ बेगम अख्तर – १

आज बेगम अख़्तर की जन्‍म-शती है. आज सुनिए उनके ये खूबसूरत ग़ज़ल. ये उनके गजलों का पहला भाग है.

संगीतकार – खय्याम




शायर : मोमिन खां मोमिन 

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो नये गिले वोह शिक़ायतें, वो मज़े मज़े की हिक़ायतें
वो हर एक बात पे रूठन तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हमसे तुमसे भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ से थे पेशतर, वो क़रम कि था मेरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़र्रा-ज़र्रा, तुम्हें याद हो के न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई, जो तुम्हारी जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही बोलना, तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना, जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ ‘मोमिन-ए-मुब्तिला, तुम्हें याद हो के न याद हो

शायर  : ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यूँ
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम गैर हमें उठाये क्यूँ

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ

‘ग़ालिब”-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं
रोइये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय-हाय क्यूँ


..

इब्न-ए-मरियुम हुआ करे कोई
मेरे दुःख की दवा करे कोई

न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई

बात पर वाँ ज़ुबान कटती है
वह कहें और सुना करे कोई

कौन है जो नहीं है हाजतमंद
किसकी हाजत रवा करे कोई

जब तवक़्क़ू ही उठ गई ‘ग़ालिब’
क्यूँ किसी का गिला करे कोई

शायर : शकील

मेरे हमनफ़स, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब, मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे

मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी, इसी रौशनी से है ज़िंदगी
मुझे डर है ऐ मेरे चाराग़र, ये चराग़ तू ही बुझा न दे

मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चाराग़र
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुक़्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे

मेरा ज़ुल्म इतना बुलन्द है के पराये शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे

वो उठे हैं लेके हुम-ओ-सुबू, अरे ओ ‘शक़ील’ कहाँ है तू
तेरा जाम लेने को बज़्म में कोइ और हाथ बढ़ा न दे

शायर : अली अहमद जलीली 

अब छलकते हुए सागर नहीं देखे जाते
तौबा के बाद ये मंज़र नहीं देखे जाते

मस्त कर के मुझे, औरों को लगा मुंह साक़ी
ये करम होश में रह कर नहीं देखे जाते

साथ हर एक को इस राह में चलना होगा
इश्क़ में रहज़ान-ओ-रहबार नहीं देखे जाते

हम ने देखा है ज़माने का बदलना लेकिन
उन के बदले हुए तेवर नहीं देखे जाते

शायर : मीर तकी मीर 

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

याँ के सफ़ेद-ओ-स्याह में हमको दख़्ल जो है सो इतना है
रात को रो रो सुबहो किया और सुबहो को ज्यों त्यों शाम किया

‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उनने तो
कश्क़ा खेंचा दैर में बैठा कबका तर्क इस्लाम किया

शायर : दाग देल्वी 


उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाकात बताते भी नहीं

ख़ूब परदा है के चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

हो चुका क़ता ताल्लुक़ तो जफ़ाएँ क्यूँ हों
जिनको मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं

ज़ीस्त से तंग हो ऐ ‘दाग़’ तो जीते क्यूँ हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं



शायर : तस्कीन कुरैशी

अब तो यही हैं दिल की दुआएं
भूलने वाले भूल ही जायें

वजह-ए-सितम कुछ हो तो बतायें
एक मोहब्बत लाख ख़तायें

दर्द-ए-मोहब्बत दिल में छुपाया
आँख के आँसू कैसे छुपायें

होश और उनकी दीद का दावा
देखने वाले होश में आयें

दिल की तबाही भूले नहीं हम
देते हैं अब तक उनको दुआएं

रंग-ए-ज़माना देखने वाले
उनकी नज़र भी देखते जायें

शग़ल-ए-मोहब्बत अब है ये ‘तस्कीं’
शेर कहें और जी बहलायें


..

किससे पूछें हमने कहाँ चेहरा-ए-रोशन देखा है
महफ़िल-महफ़िल ढूँढ चुके हैं गुलशन-गुलशन देखा है

किसको देखें किसको न देखें फूल भी हैं कलियाँ भी मगर
जिससे लगाई आँख उसी को दिल का दुश्मन देखा है

रंग-एबहार-ए-सुबह-ए-गुलिस्ताँ क्या देखे वो दीवाना
जिसकी नज़र ने एक ही गुल में सारा गुलशन देखा है

अहल-ए-वफ़ा की ख़ून की छीटें दूर तक उड़ कर जाती हैं
मेरा तड़पना देखने वाले अपना भी दामन देखा है

आज उन्हें जो चाहे समझ लो वरना यही ‘तस्कीं” है जिन्हें
कल तक हमने कू-ए-बुता में काक़-ब-दामन देखा है

शायर :  शमीम जयपुरी

इलाही काश ग़म-ए-इश्क़ काम कर जाये
जो कल गुज़रनी है मुझपे अभी गुज़र जाये

तमाम उम्र रहे हम तो ख़ैर काँटों में
ख़ुदा करे तेरा दामन गुलों से भर जाये

ज़माना अहल-ए-खिरद से तो हो चुका मायूस
अजब नहीं कोई दीवाना काम कर जाये

हमारा हश्र तो जो कुछ हुआ हुआ लेकिन
दुआएँ हैं के तेरी आक-ए-बत सँवर जाये

निगाह-ए-शौक़ वही है निगाह-ए-शौक़ ‘शमीम’
जो एक बार रुख़-ए-यार पर ठहर जाये

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