महताब(1991) – गुलाम अली

गुलाम अली के एल्बम महताब के सारे ग़ज़ल. संगीत गुलाम अली का ही है. और शायर का नाम हर ग़ज़ल के पहले लिखा हुआ है.

हबीब जमाल 

आवारगी बरंग-ए-तमाशा बुरी नहीं
ज़ौक़-ए-नज़र मिले तो ये दुनिया बुरी नहीं

कहते हैं तेरी ज़ुल्फ़-ए-परीशाँ को ज़िंदगी
ऐ दोस्त ज़िंदगी की तमन्ना बुरी नहीं

है नाख़ुदा का मेरी तबाही से वास्ता
मैं जानता हूँ नीयत-ए-दरिया बुरी नहीं

इस रहज़न-ए-हयात ज़माने से दूर चल
मर भी गये तो चादर-ए-सहरा बुरी नहीं


जान-ए-दिल जान-ए-तमन्ना कौन है
तुमसे अच्छा तुमसे प्यारा कौन है

हम तुम्हारे तुम किसी के हो गये
हम नहीं समझे हमारा कौन है

बंदा-परवर आप ही फ़रमाइये
हम बुरे ठहरे तो अच्छा कौन है

इस तमाशा-गाह-ए-आलम में ‘जमाल’
फ़ैसला कीजे तमाशा कौन है

देखना दिल की सदाएं तो नहीं
इस ख़मोशी में ये गोया कौन है

कभी तो महरबाँ हो कर बुला लें
ये महवश हम फ़रिक़ों की दुआ लें
न जाने फिर ये रुत आये न आये
जवाँ फूलों की कुछ ख़ुश्बू चुरा लें
हमारी भी सम्भल जायेगी हालत
वो पहले अपनी ज़ुल्फ़ें तो सम्भालें
निकलने को है वो महताब घर से
सितारों से कहो नज़रें झुका लें
ज़माना तो यूँही रूठा रहेगा
चलो ‘जालिब’ उन्हें चल कर मना लें

मोहसिन नकवी 
ख़ाब बिखरे हैं सुहाने क्या क्या
लुट गये अपने ख़ज़ाने क्या क्या
मुड़ के देखा ही था माज़ी की तरफ़
आ मिले यार पुराने क्या क्या
आज देखी है जो तस्वीर तेरी
याद आया है न जाने क्या क्या
सिर्फ़ इक तर्क-ए-तअल्लुक़ के लिये
तूने ढूँढे हैं बहाने क्या क्या
रात सहरा की रिदा पर ‘मोहसिन’
हर्फ़ लिक्खे थे हवा ने क्या क्या
शाम के वक़्त जाम याद आया
कितना दिलचस्प काम याद आया
जब भी देखा कोई हसीं चेहरा
मुझको तेरा सलाम याद आया
सुनके क़िस्से ख़ुदा की अज़्मत के
आदमी का मक़ाम याद आया
बंसरी की नवा को तेज़ करो
आज राधा को श्याम याद आया
सहन-ए-मस्जिद में भी हमें ‘मोहसिन’
मयकदे का क़याम याद आया

अहमद नदीम कासमी 
मुझसे क़ाफ़िर को तेरे इश्क़ ने यूँ शरमाया
दिल तुझे देख के धड़का तो ख़ुदा याद आया
चारागर आज सितारों की क़सम खा के बता
किसने इन्साँ को तबसूम के लिये तरसाया
नज़्र करता रहा मैं फूल से जज़्बात उसे
जिसने पत्थर के खिलौनों से मुझे बहलाया
उसके अन्दर कोई फ़नकार छुपा बैठा है
जानते बूझते जिस शख़्स ने धोखा खाया



परवीन शाकिर 
नज़र के सामने इक रास्ता ज़रूरी है
भटकते रहने का भी सिलसिला ज़रूरी है
मिसाल-ए-अब्र-ओ-हवा दिल-ब-हम रहें लेकिन
मुहब्बतों में ज़रा फ़ासला ज़रूरी है
वो ख़ौफ़ है क्र सर-ए-शाम घर से चलते वक़्त
गली का दूर तलक जायज़ा ज़रूरी है
तअल्लुक़ात के नाम-ओ-तिबर हवालों से
तमाम उम्र का इक राविता ज़रूरी है



कतील शिफाई 
उदास शाम किसी ख़ाब में ढली तो है
यही बहुत है के ताज़ा हवा चली तो है
जो अपनी शाख़ से बाहर अभी नहीं आई
नई बहार की ज़ामिन वही कली तो है
धुवाँ तो झूठ नहीं बोलता कभी यारो
हमारे शहर में बस्ती कोई जली तो है
किसी के इश्क़ में हम जान से गये लेकिन
हमारे नाम से रस्म-ए-वफ़ा चली तो है
हज़ार बन्द हों दैर-ओ-हरम के दरवाज़े
मेरे लिये मेरे महबूब की गली तो है

अहमद फ़राज़ 
ये क्या के सबसे बयाँ दिल की हालतें करनी
‘फ़राज़’ तुझको न आईं मोहब्बतें करनी
ये कुर्ब क्या है के तू सामने था और हमें
शुमारगी से जुदाई से साअतें करनी
कोई ख़ुदा हो के पत्थर जिसे भी हम चाहें
तमाम उम्र उसी की इबादतें करनी
सब अपने अपने करीने से मुन्तज़िर उसके
किसी को शुक्र किसी को शिकायतें करनी
मिले जब उनसे तो मुबहम सी गुफ़्तगू करना
फिर अपने आप से सौ सौ वज़ाहत करनी

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