दस कहानियां की सभी नज्में

सतरंज की बाजी 
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख के तुमने शायद सोचा था..
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने इक चिराग जला कर
अपना रास्ता खोल लिया
तुमने एक समंदर हाथ में लेकर मुझ पर ढेल दिया
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने, और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया
मेरी खुदी को तुमने चंद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया
मौत की शह देकर तुमने समझा था, अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खोल उतार कर सौंप दिया और रूह बचा ली
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी …

ख़ुदकुशी

बस एक लमहे का झगड़ा था..

दर-ओ-दीवार पर ऐसे छनाके से गिरी आवाज़,
जैसे काँच गिरता है…
हर एक शय में गई, उड़ती हुई, जलती हुई किरचियाँ..
नज़र में, बात में, लहज़े में..
सोच और साँस के अंदर,
लहू होना था एक रिश्ते का, सो वो हो गया उस दिन..
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा कर फर्श से उस शब
किसी ने काट ली नब्ज़ें
न की आवाज़ तक कुछ भी,
कि कोई जाग ना जाए..
बस एक लमहे का झगड़ा था..
सेक्स ऑन द बीच
मुझे तलाश नहीं है 
मगर वो मिलती है 
किसी ख्याल की जुम्बिश ए आरजू की तरह 
जिसका कोई चेहरा नहीं 
कोई बगुला हवा का ज़मीन से उड़ता हुआ 
या रौशनी हो कहीं और एक साया बहुत पास गिरे 
किताब खोलो तो किरदार गिर पड़े कोई
मैं जानता भी नहीं कौन है मगर वाबस्ता है मुझसे 
मुझे तलाश नहीं  है
मगर वो मिलती है 


हटक 


आले भरवा दो मेरे आँखों के
बंद करवा के उनपे ताले लगवा दो
जिस्म के जुम्बईशों पे पहले ही तुमने
अहकाम बाँध रखे हैं
मेरी आवाज़ रेंग कर निकलती है
ठाँक कर जिस्म भारी परदो में, 
दर दरिचों पे पहरे रखते हो
फ़िक्र रहती है रात दिन तुमको 
कोई सामान चोरी ना करले
एक छोटा सा काम और कर दो
अपनी उंगली डुबो कर रोगन में
तुम मेरे जिस्म पेर लिख दो
इसके जोला हुकूक अब तुम्हारे हैं
इसके जोला हुकूक अब तुम्हारे हैं
इसके सारे हक़ अब तुम्हारे हैं



रात तामीर करें 
एक रात चलो तामीर करें , ख़ामोशी के संगेमरमर पे 
हम तान के तारीकी सर पे, दो शम्माएं जलाएं जिस्मों की 
जब ओस दबे पांव उतरे, आहट भी न पाए साँसों की 
कोहरे की रेशमी खुशबू में, खुशबू की ही तरह लिपटे रहे 
और जिस्म के सौंधे पर्दों में, रूहों की तरह लहराते रहे 
एक रात चलो तामीर करें 

तलाक

वक़्त वक़्त को जितना गूँध सके हम गूँध लिया
आटे की मिक़्दार कभी बढ़ भी जाती है
भूख मगर इक हद से आगे बढ़ती नहीं
पेट के मारों की ऐसी ही आदत है-
भर जाए तो दस्तरख़्वान से उठ जाते हैं।
आओ, अब उठ जाएँ दोनों
कोई कचहरी का खूँटा दो इंसानों को
दस्तरख़्वान पे कब तक बाँध के रख सकता है
कानूनी मोहरों से कब रुकते हैं, या कटते हैं रिश्ते
रिश्ते राशन कार्ड नहीं हैं

तेरे उतारे हुए दिन 

तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी

इलायची के बहुत पास रखे पत्थर पर
ज़रा सी जल्दी सरक आया करती है छाँव
ज़रा सा और घना हो गया है वो पौधा
मैं थोड़ा थोड़ा वो गमला हटाता रहता हूँ
फकीरा अब भी वहीं मेरी कॉफी देता है
गिलहरियों को बुलाकर खिलाता हूँ बिस्कुट
गिलहरियाँ मुझे शक़ की नज़रों से देखती हैं
वो तेरे हाथों का मस्स जानती होंगी…
कभी कभी जब उतरती हैं चील शाम की छत से
थकी थकी सी ज़रा देर लॉन में रुककर
सफेद और गुलाबी मसूरे के पौधों में घुलने लगती है
कि जैसे बर्फ का टुकड़ा पिघलता जाए विहस्की में
मैं स्कार्फ दिन का गले से उतार देता हूँ
तेरे उतारे हुए दिन पहन कर 
अब भी मैं तेरी महक में कई रोज़ काट देता हूँ
तेरे उतारे हुए दिन टँगे हैं लॉन में अब तक
ना वो पुराने हुए हैं न उनका रंग उतरा
कहीं से कोई भी सीवन अभी नहीं उधड़ी..

ख़ाली समंदर
उसे फिर लौट के जाना है

ये मालूम था उस वक़्त भी जब शाम की
सुर्ख-ओं-सुनहरी रेत पर वह दौड़ती आई थी
और लहरा के
यूं आग़ोश में बिखरी थी 
जैसे पूरे का पूरा समंदर ले के उमड़ी है

उसे जाना है, वो भी जानती तो थी
मगर हर रात फिर भी 
हाथ रख कर चाँद पर खाते रहे कसमे
ना मैं उतरूँगा अब साँसों के साहिल से,
ना वो उतरेगी मेरे आसमाँ पर झूलते तारों की पींगों से
मगर जब कहते-कहते दास्ताँ 
फिर वक़्त ने लम्बी जम्हाई ली,
ना वो ठहरी
ना मैं ही रोक पाया था!
बहुत फूँका सुलगते चाँद को, फिर भी उसे
इक इक कला घटते हुए देखा
बहुत खींचा समंदर को मगर साहिल तलक हम ला नहीं पाये,
सहर के वक़्त फिर उतरे हुए साहिल पे
इक डूबा हुआ ख़ाली समंदर था!

बौछार 
मैं कुछ-कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको
तेरा चेहरा भी धुँधलाने लगा है अब तख़य्युल में
बदलने लग गया है अब वह सुबह शाम का मामूल
जिसमें तुझसे मिलने का भी एक मामूल शामिल था
तेरे खत आते रहते थे
तो मुझको याद रहते थे
तेरी आवाज़ के सुर भी
तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके
मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ
कि जैसे तितलियों के पर लगा लेता है कोई अपनी एलबम में

तेरा बे को दबा कर बात करना
वॉव पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था
बहुत दिन हो गए देखा नहीं ना खत मिला कोई
बहुत दिन हो, गए सच्ची
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं

देर आयद 
आठ ही बिलियन उम्र ज़मीं की होगी शायद
ऐसा ही अंदाज़ा है कुछ ‘साईन्स’ का
चार अशारिया छ: बिलियन सालों की उम्र तो
बीत चुकी है
कितनी देर लगा दी तुम ने आने में
और अब मिल कर
किस दुनिया की दुनियादारी सोच रही हो
किस मज़हब और ज़ात और पात की फ़िक्र लगी है
आओ चलें अब
तीन ही ‘बिलियन’ साल बचे हैं!

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